यूपी में 2027 से पहले दलित वोटबैंक पर सियासी घमासान, बीजेपी के 7 महीने के महाअभियान से विपक्ष की बढ़ी बेचैनी

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोटबैंक को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। बीजेपी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी समेत तमाम दल दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। दलित वोटों को आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता की चाबी माना जा रहा है, यही वजह है कि सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से दलित समाज को साधने की कोशिश में जुटे हैं।
बीजेपी ने दलित वोटबैंक को मजबूत करने के लिए संत रविदास के नाम पर सात महीने के महाअभियान की शुरुआत की है। अभियान के शुभारंभ को लेकर वाराणसी में दो दिन तक विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन इस अभियान का शुभारंभ करेंगे। बीजेपी की रणनीति संत रविदास के संदेश और उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के साथ दलित समाज के बीच पार्टी की पहुंच को और मजबूत करने की है।
बीजेपी के इस बड़े अभियान को विपक्षी दलों के दलित वोटबैंक की राजनीति की काट के तौर पर भी देखा जा रहा है। खासतौर पर समाजवादी पार्टी के PDA फॉर्मूले और कांग्रेस की दलित राजनीति के बीच बीजेपी ने अपना सियासी आधार मजबूत करने की रणनीति तैयार की है। बीजेपी के अभियान से सपा, बसपा और कांग्रेस की बेचैनी बढ़ने की चर्चा भी राजनीतिक गलियारों में तेज है।
वहीं, समाजवादी पार्टी भी अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को और मजबूत करने में जुटी है। पार्टी सामान्य यानी अनारक्षित सीटों पर भी करीब 100 दलित उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारने की योजना पर काम कर रही है। सपा की कोशिश है कि दलित वोटरों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई जाए और 2027 के चुनाव में PDA गठजोड़ को मजबूत चुनावी समीकरण में बदला जा सके।
कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की कवायद में जुटी है। पार्टी दलित वोटबैंक को साधने के लिए संगठन में बदलाव के साथ किसी वरिष्ठ दलित चेहरे को प्रदेश की कमान सौंपने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। कांग्रेस की कोशिश है कि दलित समाज के बीच पार्टी का पुराना जनाधार फिर से मजबूत किया जा सके।
दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी अपने पारंपरिक दलित वोटबैंक को दोबारा पूरी तरह अपने पाले में लाने की तैयारी में है। बसपा के लिए 2027 का चुनाव अपने मूल सामाजिक आधार को मजबूत करने की चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, आजाद समाज पार्टी भी दलित राजनीति में अपनी मौजूदगी लगातार मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव से काफी पहले ही दलित वोटबैंक को लेकर जंग शुरू हो चुकी है। अब देखना होगा कि बीजेपी का संत रविदास महाअभियान, सपा का PDA फॉर्मूला, कांग्रेस की संगठनात्मक रणनीति और बसपा की पारंपरिक सोशल इंजीनियरिंग में से कौन सा दांव दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में कामयाब होता है।
