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भारतीय मूल की नवी पिल्लई को मिला 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार; ट्रंप रह गए पीछे, जानें भारत का गौरवशाली इतिहास

करुणा और अहिंसा को मिला दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों और न्याय की लड़ाई लड़ने वाली भारतीय तमिल मूल की मशहूर कानूनी विशेषज्ञ और दक्षिण अफ्रीका की वरिष्ठ न्यायविद नवेनेम “नवी” पिल्लई (Navi Pillay) को साल 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने उनके नाम का आधिकारिक एलान करते हुए बताया कि उन्हें यह सर्वोच्च सम्मान दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत बनाने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने में उनके जीवनभर के ऐतिहासिक योगदान के लिए दिया जा रहा है।

85 वर्षीय नवी पिल्लई का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक भारतीय तमिल मूल के परिवार में हुआ था। रंगभेद के उस कठिन दौर में संघर्ष करते हुए वे न केवल दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट की पहली अश्वेत महिला जज बनीं, बल्कि बाद में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में भी वैश्विक स्तर पर अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने रवांडा नरसंहार के मामलों में ऐतिहासिक न्याय सुनिश्चित किया और हाल ही में गाजा के संवेदनशील मुद्दे पर भी खुलकर मानवाधिकारों की आवाज़ बुलंद की। नवी पिल्लई को यह पुरस्कार मिलना दुनिया भर के भारतीयों के लिए एक बेहद गर्व का क्षण है।

भारत का नोबेल इतिहास: अब तक कुल कितने भारतीयों को मिला सम्मान?
नवी पिल्लई को मिले इस वैश्विक सम्मान के बीच भारत का नोबेल पुरस्कारों से जुड़ा इतिहास एक बार फिर चर्चा में आ गया है। ज्ञान, विज्ञान, साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में भारत की धरती और यहाँ के सपूतों का डंका हमेशा से बजता रहा है। अब तक कुल 12 भारतीय और भारतीय मूल के प्रख्यात व्यक्तित्वों को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
इस गौरवशाली सिलसिले की शुरुआत साल 1913 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर (साहित्य) से हुई थी, जो नोबेल पाने वाले पहले एशियाई भी थे। इसके बाद से भारत की झोली में लगातार ये पुरस्कार आते रहे हैं:
  1. रवींद्रनाथ टैगोर (साहित्य, 1913)
  2. सर सी.वी. रमन (भौतिकी, 1930)
  3. हरगोविंद खुराना (चिकित्सा, 1968)
  4. मदर टेरेसा (शांति, 1979)
  5. सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (भौतिकी, 1983)
  6. अमर्त्य सेन (अर्थशास्त्र, 1998)
  7. वेंकटरामन् रामकृष्णन (रसायन, 2009)
  8. कैलाश सत्यार्थी (शांति, 2014)
  9. अभिजीत बनर्जी (अर्थशास्त्र, 2019)
डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल न मिलने से क्यों बढ़ी पुरस्कार की विश्वसनीयता?
इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार एक और बड़ी वजह से वैश्विक मीडिया की सुर्खियों में है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से इस बात की इच्छा और लॉबिंग करते रहे हैं कि वैश्विक शांति प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार उन्हें मिलना चाहिए। लेकिन नोबेल समिति द्वारा उनके दावों को दरकिनार कर एक ऐसी शख्सियत (नवी पिल्लई) को चुनना जिसने बिना किसी राजनीतिक पद के जमीनी स्तर पर पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ी, पुरस्कार की साख को और ऊपर ले जाता है। 
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप जैसे विवादित और शक्तिशाली राजनेताओं को इस सम्मान से दूर रखना यह साबित करता है कि [नोबेल शांति पुरस्कार] किसी राजनीतिक प्रभाव, लॉबिंग या महाशक्तियों के दबाव में नहीं दिया जा सकता। जब यह पुरस्कार किसी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के बजाय नवी पिल्लई, कैलाश सत्यार्थी या मदर टेरेसा जैसे निस्वार्थ मानवतावादियों के हाथों में जाता है, तो इसकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता दुनिया की नजरों में और ज्यादा पुख्ता हो जाती है। यह संदेश साफ है—नोबेल शांति पुरस्कार केवल सत्ता के प्रभाव से नहीं, बल्कि सत्य और न्याय के प्रति अडिग साहस से ही कमाया जा सकता है।

 

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